12 अप्रैल 2010

पूर्वांचलीय भाषा, हिंदी और देवनागरी लिपी

ज़ाकिर हुसैन
पी-एच.डी. हिंदी तुलनात्मक साहित्य

वर्तमान रूप में हिंदी इतनी सर्वग्राही तथा लचीली है कि वह प्राय: सभी प्रकार के प्रचलित भावों, ज्ञान-विज्ञान एवं प्रचलित शब्दों को अपनाने में समर्थ हैं। हिंदी भाषा अपनी गर्भ में सभी भाषाओं के शब्दों को पचाने में जितनी समर्थ है उतनी कोई भाषा नहीं। संस्कृत की सहायता ने तथा विद्वानों के प्रयत्न ने इसका शब्द-भंडार अत्यंत व्यापक तथा बहुद्देश्यपूर्ण बना दिया। संस्कृत साहित्य की व्याकरण संबंधी जटिलता हिंदी में घट गयी है। इस भाषा में 'रामचरितमानस', 'सूर-सागर', बिहारी सतसई', 'प्रिय-प्रवास', 'कामायनी' जैसे महान ग्रंथ बन चुके हैं। आज हिंदी के प्रौढ़ विद्वान अब भारत में हीं नहीं , अपितु विदेशों में भी हैं।

जब मन में सवाल खड़ा होता है कि हिंदीतर अर्थात पूर्वोत्तर प्रदेश में प्रचार -प्रसार की क्या स्थिति रही तथा उन प्रदेशों की भाषाओं के विकास में हिंदी की क्या भूमिका रही है? तब इन सवालों के सही उत्तर खोजने के लिए इन भाषाओं के अंतरसंबंधों की चर्चा करना जरूरी है। पर यह विषय इतना व्यापक है कि समयाभाव से इसकी खुलकर चर्चा करना संभव नहीं है, इसलिए जहां तक संभव है संक्षेप में इस विषय पर चर्चा करने का प्रयास किया गया है।

पूर्वोत्तर भारत में हिंदी के प्रचार -प्रसार को देखते हुऐ इसे '' क्षेत्र के नाम से घोषित किया गया है। जो पूर्णरूप से हिंदीतर प्रदेश है। जिसे सात बहनों के राज्य के नाम से जाना जाता है। संविधान सभा ने जिस समय इस क्षेत्र को '' क्षेत्र के रूप में घोषित किया है,तब से अब तक इस क्षेत्र की स्थिति काफी सुधरी है। पहले से अब ज्यादा हिंदी में साहित्य रचे जा रहें हैं। सरकारी, गैर-सरकारी सभी कार्यलयों में हिंदी के इस्तेमाल में काफी वृध्दि हुई है। प्रिंट मीडिया एवं इलेक्ट्रानिक मीडिया में हिंदी ने काफी जगह बना ली है। इसके अतिरिक्त प्राचीन काल में महापुरूष शंकरदेव तथा उनके समसामयिक समस्त रचनाएं ब्रज भाषा में हुई। इस प्रकार पूर्वोत्तर राज्यों में हिंदी का संपर्क पूर्वोत्तरीय सभी भाषाओं के साथ हो रहा है। ज्ञान-साहित्य के क्षेत्र में ये भाषाएं एक-दूसरे से आदान-प्रदान करके अपने साहित्य भंडार को समृध्द कर रहा है।

पूर्वोत्तर राज्यों के साथ बाहरी राज्यों का संपर्क आरंभ से ही रहा है। इन राज्यों में व्यापारिक व सेना-सुरक्षाबल के सैनिकों के कारण तथा मारवाड़ियों से राष्ट्रीय एकता एवं सुरक्षा की भावना के साथ राष्ट्रभाषा के प्रचार-प्रसार का काम भी अनौपचारिक रूप से सुरक्षित रहा । पूर्वी उत्तर प्रदेश (गाजीपुर,बलिया,आरा,मऊ,आजमगढ़) से श्रमजीवी के रूप में आए लोगों से संपर्क के लिए हिंदी भाषा का व्यवहार किया । आवश्यकतावश कभी वे यहां की भाषा सीखी और अपनी भाषा यहां के लोगों को सिखायी। इसप्रकार भाषाई लेन-देन चलता रहा। इसके अतिरिक्त उन्होंने अपने साथ 'रामचरित मानस' तथा ग्रंथों के उपहारों से इसे हिंदीमय बना दिया। हिंदी भाषा का इस प्रकार धीरे-धीरे पूर्वोत्तर में फलना-फूलना शुरू हुआ।

पूर्वांचल में वास्तविक रूप का पदार्पण तब हुआ, जब सन 1934ई.में 'अखिल भारतीय हरिजन सेवा संघ' की स्थापना हेतु महात्मा गांधी असम आये। उन्होंने जगह-जगह संबोधनों में असमिया को हिंदी से परिचित होने की बात कही थी, उनके प्रत्युत्तर में गड़ मुड़ सर्वाधिकार श्री श्री पीतांबर देव गोस्वामी ने सूचित किया था कि 'यहां हिंदी सिखाने वालों की कमी है। अत: यदि यह व्यवस्था हो जाए, तो हम हिंदी शिक्षा की व्यवस्था करेंगे।' इससे गांधी जी संतुष्ट होकर बाबा राघवदास को हिंदी प्रचारक के रूप में नियुक्त करके असम भेजा। उनकी संतमय, तेजोमय तथा तपस्वी जीवन से पूर्वांचल सदा गौरवान्वित है।

प्रत्यक्ष रूप में तो नहीं पर परोक्ष रूप में देखा जाता है कि जिन भाषाओं की लिपि देवनागरी है, वह भाषा हिंदी न होते हुए भी उस भाषा के जरिए हिंदी भाषा का प्रचार संभव हो सका है। उदाहरण के रूप में अरूणाचल में मोनपा, मिजि, और अका, असम में मिरि, मिसमि और बोड़ो, नागालैंड में अडागी, सेमा, लोथा, रेग्मा, चाखे तांग फोम तथा नेपाली, सिक्किम में नेपाली लेपचा, भड़पाली, लिम्बू आदि भाषाओं के लिए देवनागरी लिपि है। देवनागरी लिपि अधिकांश भारतीय लिपियों की जननी रही है। अत: इसके प्रचार-प्रसार के पूर्वोत्तर में हिंदी शिक्षा का सुगम हो गया।

असम में बोड़ो भाषा के लिपि के लिए अनेक राजनीति चली। अंतत: यह राजनीति तब समाप्त हुई जब उस समय की तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी जी ने बोड़ो भाषा के लिए 'देवनागरी लिपि' की प्रयोग के लिए अनुमति दी। परिणामत: यह हुआ कि फिलहाल बोड़ो भाषा के लिए 'देवनागरी लिपि' का प्रयोग हो रहा है। इस क्षेत्र में इस विषय से संबंधित बड़े पैमाने पर वैज्ञानिक अध्ययन हो रहे हैं। जिसके लिए देवनागरी के संशोधन के बाद बोड़ो भाषा के लिए उपयोगी साबित हुई है। अभी असम की भाषाओं में 'बोड़ो'चीनी परिवार की ही भाषा है, जिसके लिए 'नागरी'प्रयोग हो रहा है।

पूर्वांचल के निर्देशक के रूप में सुशील कुमार चौधरी कार्यरत है। दनके प्रयास से निम्नलिखित हिंदी के क्षेत्रीय कार्यालयों के संचालन हो रहे

हैं-

क्रम संख्या

संस्था का नाम

मान्यता प्राप्त परीक्षा का नाम

1.

असम राज्य राष्ट्रभाषा प्रचार समिति

1.प्रथमा 2.प्रारंभिक 3.प्रवेश

4.परिचय 5.कोविद 6.रत्न

2.

मेघालय राष्ट्रभाषा प्रचार समिति

..........

3.

मणिपुर राष्ट्रभाषा प्रचार समिति

..........

4.

त्रिपुरा राष्ट्रभाषा प्रचार समिति

..........

5.

नागालैंड राष्ट्रभाषा प्रचार समिति

..........

उपर्युक्त संस्‍थाओं के अतिरिक्त पूर्वांचल में और तीन स्वैच्छिक हिंदी संस्था है :-

क्रम संख्या

संस्था का नाम

मान्यता प्राप्त परीक्षा का नाम

1.

असम राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, गुवाहाटी

1.प्रबोध 2.विशारद 3.प्रवीण

2.

म्णिपुर हिंदी परिषद, इंफाल

1.प्रबोध 2.विशारद 3.रत्न

3.

मिजोरम हिंदी प्रचार सभा, आइजोल

1.प्रबोध 2.विशारद 3.प्रवीण

उल्लिखित संस्थाओं के जरिए पूर्वांचल में सौ-सौ ज्यादा हिंदी विद्यालयों का संचालन हो रहा है, जिसमें हर सौ-सौ छात्र-छात्राएं हिंदी में परीक्षा पास करके रोजगार प्राप्त कर रहें हैं। पूर्वांचल में विभिन्न जाति-जनजाति निवास करती है। उनकी भाषा अलग-अलग हैं। ऐसी स्थिति में अनुवाद महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है। एक भाषा का साहित्य दूसरी भाषा में अनुवाद करके रसास्वादन करना आसान है इससे एक-दूसरे की भाषा,कला-संस्कृति, रीति-रिवाज को जानना समझना सुगम होता है। हिंदी भाषा इस क्षेत्र में पूर्वांचल के लिए अनुवाद की भाषा बनकर महत्वपूर्ण कदम उठा रही है। हम ऐसे देखते हैं कि असमिया ,बोड़ो,कार्बी,राभा,बंगला,नेपाली, आदि साहित्यों के हिंदी में अनुवाद के बाद ही अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त होती है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि पूर्वांचल की भाषाओं के विकास में हिंदी की अहम भूमिका रही है।

अनुवाद के क्षेत्र में डॉ. गार्गी गुप्त का योगदान

सुभेध खु. हाडके

एम.ए., अनुवाद-प्रौद्योगिकी विभाग


वह समय था जब पाश्चात्य देशों में अनुवाद सिध्दान्त पर खूब चर्चा परिचर्चाएँ की जाती थी, पर भारत में साहित्य के क्षेत्र में इस विधा को पूर्णरूपेण मान्यता नहीं मिल पाई थी । ऐसे समय में इस विधा को प्रतिष्ठित करने का बडा कार्य डॉ. गार्गी गुप्त ने उठाया ।

डॉ गार्गी गुप्त का जन्म 2 अक्टूबर 1929 को मुरादाबाद, उत्तरप्रदेश में हुआ । 2 अक्टूबर का दिन भारत के इतिहास में परम पुनीत दिवस माना जाता है क्योंकि इस दिन कई महान विभूतियों का जन्म इस देश में हुआ है । बाल्यकाल से ही विलक्षण प्रतिभा प्राप्त गार्गी गुप्त जी उपनिषदों की विख्यात विदुषी 'गार्गीजी' के संस्कार लेकर वर्तमान युग में नया दायित्व निभाने के लिए अवतरित हुई थीं। उन्होंने स्वाधिनता प्राप्ती के पश्चात नवोदित राष्ट्र की गरिमा के अनुरूप राजभाषा के रूप में हिन्दी के प्रगति रथ चक्र को आगे बढाने के लिए हिन्दी प्रेमियों को साथ कदम मिलाकर चलने के लिए अपने जीवन चक्र को एक नई दिशा प्रदान की और अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने देश विदेश में हिंदी साहित्य का अध्ययन-अध्यापन करने के साथ-साथ विदेशी भाषाओं का भी अध्ययन करके अनुवाद को अपना कार्यक्षेत्र बनाया और जीवन पर्यंत विविध राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय भाषाओं एवं संस्कृतियों के बीच समन्वय स्थापित करने का अथक प्रयास किया ।

डॉ. गुप्त ने दिल्ली विश्वविद्यालय से रूसी भाषा में रूसी पेरू विश्वविद्यालय, इटली से इतालवी भाषा में डिप्लोमा किया । कोलम्बिया ग्रेज्युएट स्कुल ऑफ जर्नलिस्ट अमेरिका से पत्रकारिता में एम.ए. किया और 'रामकाव्य परम्परा में रामचंद्रिका का विशेष अध्ययन' विषय में शोध प्रबंध के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय से पी एच.डी. की उपाधी प्राप्त की। तदनंतर विभिन्न विद्यालयों और बाद में गृह मंत्रालय में 2 वर्ष तक हिंदी का अध्ययन का कार्य करने के बाद सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के प्रकाशन विभाग में उपसंपादक के पद पर कार्य किया । इस दौरान उन्होंने लगभग 30 पुस्तक पुस्तिकाओं का अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद किया और 'बालभारती' पत्रिका में संपादन सहयोग एवं स्वतंत्र लेखन किया । फिर उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में अनुवाद प्रमाण पत्र पाठयक्रम में प्राध्यापक के पद पर कार्य करते हुए अनुवाद के क्षेत्र में एक नई शुरूआत की । फिर वेनिस विश्वविद्यालय में भारतीय भाषा-विभाग में हिन्दी प्राध्यापक के रूप में कार्य किया । इस प्रकार उन्होंने न केवल देश में बल्कि विदेश में भी हिन्दी से जुडे विभिन्न पदों पर कार्य करते हुए हिन्दी की प्रगति एवं विकास में महत्वपूर्ण योगदान किया ।

भारतीय अनुवाद परिषद की संस्थापिका डॉ. गार्गी गुप्त के पूरे परिचय के लिए भारतीय अनुवाद परिषद महत्वपूर्ण है । सन 1964 में भारतीय अनुवाद परिषद की स्थापना करके डॉ. गार्गी गुप्त ने एक नए युग का सुत्रपात किया । भारतीय अनुवाद परिषद विगत 34 वर्षो से अनुवाद, भाषा, साहित्य, शोध, शिक्षण - प्रशिक्षण तथा सृजनात्मक चिंतन-मनन में कार्यरत एवं समर्पित पंजीकृत संस्था है जो मूल साधक की तरह राष्ट्रहित के गम्भीर दायित्व का अनवरत निर्वाह कर रही है। विद्वत समाज का अभिनन्दनध्द-सम्मान तथा पुरस्कार स्वरूप श्रध्दा अर्पित करने वाली इस संख्या ने समय-समय पर देश-विदेश के अनुवादविदों एवं सेवियों को सम्मानित तथा अपने सीमित साधकों के बावजूद पुरस्कृत करने का कार्य कर रही है।

अनुवाद परिषद ने अपनी इस 34 वर्षीय सुदीर्घ यात्रा में जो उर्जा प्राप्त की उसका श्रेय डॉ. गार्गी गुप्त की विशेष भूमिका से है तथा उनके कर्मठ सहयोगियों के त्याग, परिप्रेम, तथा संकल्प से कार्य आगे बढ. रहा है। भारतीय अनुवाद परिषद ने केवल अनुवाद जगत में अपितु अनुवाद अनुविक्षण का मानक रूप स्थपित करने के क्षेत्र में भी एक किर्तिमान स्थपित कर रही है। अनुवाद-प्रशिक्षण, अनुवाद-संबंधी पुस्तकों, शोध ग्रंथों का प्रकाशन, अनुवाद विषयक वाद-विवाद प्रतियोगिताओं अनुवाद विषयक अनुशिक्षण चर्चाओं (कार्यशाला) का नियमित आयोजन जैसी महत्वपूर्ण गतिविधियों को कार्यन्वित करने का प्रमुख कार्य परिषद कर रही है।

अनुवाद जगत में अनेक ऐसे अनुवादकों, साहित्य-सेवाओं तथा नवोन्मेष शालिनी प्रतिभाओं को अनुवाद की दिशा में प्रेरित-प्रोत्साहित करना परिषद का मूल उद्देश्य है जिनकी प्रतिभा से राष्ट्र-हित एवं विश्व कल्याण का स्वप्न साकार हो रहा है। तभी आज समस्त जगत में अनुवाद को सृजनात्मक-साहित्य के समकक्ष देखा जा रहा है।

संदर्भ- 1. अनुवाद अंक july - December 1998, 2. अनुवाद अंक july - December 1999, 3. अनुवाद अंक 2008


भर्तृहरि और उनका भाषा-चितंन

र्तृहरि का व्यक्तित्व युगांतरकारी था। वह परम योगीराज, वेदों के अप्रतिम ज्ञाता, अग्रणी कवि, महावैयाकरण और परम पदवाक्यप्रमाणज्ञ भी थे। उनका स्त्रोत नाथपंथियों की परंपरा रही हो या बौद्ध साधकों की परंपरा। पश्चिम में प्रमाणिक समझा जाने वाला चीनी यात्री इत्सिंग ही एकमात्र ऐसा विदेशी इतिहासकार है, जिसने भर्तृहरि का उल्लेख किंचित विस्तार से दिया है। किंतु यह परिचय स्वत: किवदंतियों एवं जनश्रुतियों पर आधारित है। वैयाकरणों के वक्तव्यों और ग्रथों के अतिरिक्त भर्तृहरि के इस वैयाकरण रूप का परिचय हमें उनके सम्बद इत्सिंग की उक्ति से ही मिलता है। जहां तक उनकी सर्वाधिक महत्वपूर्ण कृतियां ''महाभाष्यटीका एवं वाक्यपदीय'' का संबंध है। परंतु भर्तृहरि के संबंध में इत्सिंग का शेष वक्तव किंवदतियों एवं जनश्रुतियों पर आधारित है। उनके कथानुसार पूर्वोक्त दोनों स्त्रोतों से उपलब्ध तथ्य उन्हें स्वीकार थे और बौध्द परंपरा में गृहस्थ और संन्यास के बीच आवागमन की छूट दी है। इसीलिए यह वक्तव उन्हें बौध्द सिध्द करने का पर्याप्त आधार माना जा सकता है। इसके आधार पर भर्तृहरि का जीवनकाल 600 से 650 ईस्वी के आसपास का माना जा सकता है। महावैयाकरण भर्तृहरि का काल ''कोशिका'' की रचना सातवीं शती ई. से पूर्व ही होना चाहिए। अत: पांचवीं शती के आरंभ से लेकर छठी शती के आरंभ के बीच उनका काल रखना अधिक उचित है।

भर्तृहरि की कृतियां:-

श्री युधिष्ठिर मीमांसक ने विविध प्राचीन उल्लेखों के आधार पर निम्न नौ कृतियां बताई हैं।-

1 महाभाष्यटीका, 2 वाक्यपदीय, 3 वाक्यपदीय के प्रथम दो कांडों पर स्वोपज्ञा वृत्ति, 4 शतकत्रय-नीति श्रृंगार एवं वैराग्य, 5 मीमांसासूत्रवृत्ति, 6 वेदांतसूत्रवृत्ति, 7 शब्द धातुसमीक्षा, 8 भागवृत्ति, 9 भर्तृहाव्य

इनमें आठवें ग्रंथ के उनके द्वारा रचित न होने का कारण यह है कि न तो इसकी भाषा ही भर्तृहरि की प्रकृति के अनुकूल एवं सरल है और न ही इसमें व्यक्त बहुत से समाधान भर्तृहरि के महाभाष्यटीकोक्त एवं वाक्यपदीयोक्त मतों से मिलता है। शेष सातों रचनों में से प्रथम चार तो किसी न किसी रूप में उपलब्ध हैं, जबकि संख्या 5 से 7 तक की पुस्तकों का उनके नाम से केवल उल्लेख मात्र मिलता है।

''वाक्यपदीय'' तीन कांडों में निबध्द रचना है। पूर्वोक्त टीका में भर्तृहरि महाभाष्य की उक्तियों पर ही टिप्पणी कर रहे थे, अत: उन्हें अपने मतव्यों को न तो व्यक्त करने का अवकाश था और न ऐसा करना उचित ही था। इसीलिए भर्तृहरि ने उस प्रसंग में व्यक्त किए गए अपने संपूर्ण भाषाचितंन एवं व्याकरण दर्शन को स्वतंत्र रूप से पुनर्गठित करने पूर्ण स्वतंत्रता के साथ ''वाक्यपदीय के तीन कांडों में निबद्ध किया है।

महाभाष्यटीका:-

कैयट के ''महाभाष्यप्रदीप'' के अध्ययन एवं विश्लेषण से पता चलता है कि उसे न केवल ''वाक्यपदीय'' एवं ''महाभाष्यटीका'' दोनों का पूरा परिचय था, बल्कि उसने उन दोनों का पूरा लाभ भी उठाया है। तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया है कि कैयट एवं महाभाष्य के अन्य अनेक परवर्ती टीकाकारों ने भर्तृहरि की ''महाभाष्यटीका'' का अनुकरण संक्षेप मात्र ही किया है। स्वयं भर्तृहरि अपने वाक्यपदीय में 'भाष्य' की ओर बार बार इंगित करते हैं। वे सब बातें महाभाष्य में उल्लिखित नहीं मिलती। यदि भर्तृहरि की टीका पूर्णत: उपलब्ध होती, तब उनका तथ्यांकन हो सकता था। दूसरी ओर, यदि उनकी टीका का विश्लेषण किया जाये, तो वाक्यपदीय का कोई भी अध्येता यह पाएगा कि पदे-पदे वाक्यपदीय के ही वक्तव्य गद्यात्मक ढंग से कहे गये हैं। यह अवश्य है कि कहीं-कहीं शब्दावली वाक्यपदीय में प्रयुक्त शब्दावली से भिन्न हैं। पूर्ण विश्लेषण करने पर विद्वानों ने पाया है कि टीका की रचना निश्चय ही भर्तृहरि पहले ही कर चुके थे।

वाक्यपदीय:-

पिछले दो-तीन दशको में ही इस अकेली कृति ने विश्व के भाषाविदों का जितना ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया है, उतना किसी अन्य कृति ने नहीं। इसलिए इसे सवाधिक प्रामाणिक माना जाता है। इस पर भी क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है कि इसी शती के पाचवें दशक कके पूर्वार्ध्द तक इस कृति का एक भी पूर्ण एवं संपादित संस्करण उपलब्ध नहीं था जो कुछ था भी न मिलता था। पंचम दशक के उत्तरार्ध्द में इसके प्रथम कांड ब्रह्मकांड का पूर्ण एवं प्रामाणिक प्रथम संस्करण लाहौर से संपादित हुआ। भर्तृहरि के वाक्यपदीय को तीन काडों में विभाजित किया गया है।

1 प्रथम कांड: आगम या ब्रह्मकांड

2 द्वितीय कांड: वाक्यकांड

3 तृतीय कांड: व्याकरण का दर्शन

भाषाविज्ञान संबंधी योगदान :-

भर्तृहरि ने व्याकरण और भाषाविज्ञान दोनों ही क्षेत्र में अभूतपूर्ण योगदान दिए हैं। त्रिपदी टीका एवं वाक्यपदीय में व्यक्त धारणाओं एवं विवेचन को, व्याकरण संबंधी सामान्य धारणा से पृथक करके, महाभाष्य की पृष्ठभूमि पर समझने का प्रयास करना चाहिए।

1 वाक्: अभिव्यक्ति का माध्यम -

भर्तृहरि के अनुसार यदि वाणी का भाषा रूप या भषिक रूप न रहे, तो समस्त ज्ञान-विज्ञान ही नहीं, मानव की समस्त चेतन प्रक्रिया तक अर्थहीन हो जाएगी।
2
भाषा की परिभाषा:-

प्रयोक्ता (वक्ता) और ग्रहीता (श्रोता) के बीच अभिप्राय या आदान-प्रदान केवल शब्द के ही माध्यम से होता है। ज्यों ही प्रयोक्ता का बुद्धयर्थ बन जाता है, भाषा या शब्द का कार्य पूरा करता है।

3 भाषा का ज्ञानार्जन:-

भाषा सीखते समय बालक जो अशुध्द उच्चारण करता है, उसका दर्थ विनिश्चय उसके मूल शब्द के द्वारा किया जाता है।

4 भाषा:संस्कृत और प्राकृत रूप -

भाषा विकास के संबंध में प्रमुखत: दो मत हैं: ''अनित्यवाद एवं नित्यवाद। नित्यवाद के अनुसार भाषा दैवी या देव प्रदत्त है और उसे जन प्रचलित नए नए प्रयोग के द्वारा व्यतिकीर्ण होता है। अनित्यवाद के अनुसार जनता में प्रचलित होने वाला रूप ही मूल होता है।

5 साधु-असाधु प्रयोग:-

साधु या व्याकरण सम्मत शब्द वह है जो शिष्ट प्रयोग का विषय हो तथा आगम अर्थात शास्त्रादि में धर्मादि साधन के लिए व्यवहृत होता हो। आगम का अर्थ परंपरा से अविच्छिन्न उपदेश अर्थात श्रुतिस्मृति लक्षण ज्ञान हैं धर्म का विधान उन्ही श्रुतियों में किया है। श्रुति को अकर्तृक, अनादि और अविच्छिन्न माना है।

6 अपभ्रंश या लोकभाषा का महत्व:-

जिस प्रकार श्रुति के अविच्छिन्न होने से उसमें प्रयुक्त शब्द नित्य होते हैं, उसी प्रकार अर्थ को वहन करने एवं जन प्रयोग होने के कारण असाधु या अपभ्रंश शब्द भी अव्यवच्छेय होते हैं।

7 व्याकरण का प्रयोजन और क्षेत्र-

व्याकरण का प्रयोजन किसी नवीन या कृत्रिम भाषा का निर्माण नहीं है, बल्कि जनप्रयोग किसी शिष्ट प्रयोगाकूल शब्दों का साधुत्व विधान है ताकि उन शब्दों का प्रचलन एवं अनुकरण अधिकाधिक एवं उचित रूप में हो सके। आगम और श्रुति के नित्य एवं परंपरागत रूप में अविच्छिन्न होने के कारण साधु प्रयोग भी नित्य एवं विहित प्रयोगों पर आश्रित होता है। इसी कारण व्याकरण भी एक स्मृति ही है। इस व्याकरण का क्षेत्र केवल ''वैखरी'' या उच्चरित वाक् तक ही सीमित नहीं है, प्रत्युत ''मव्यमा और पश्यंती'' भी इसी के क्षेत्र में आती हैं।

8 शब्दब्रह्म-

मानव अभिव्यक्ति का एकमात्र माध्यम होने के वाक् या शब्द नित्य है, इसकी अर्थभावना से ही जागतिक प्रकिया चल पाती है।

-प्रस्‍तुति
योगेश उमाले
एम.ए., भाषा-प्रौद्योगिकी विभाग

भर्तृहरि और उनका भाषा-चितंन

र्तृहरि का व्यक्तित्व युगांतरकारी था। वह परम योगीराज, वेदों के अप्रतिम ज्ञाता, अग्रणी कवि, महावैयाकरण और परम पदवाक्यप्रमाणज्ञ भी थे। उनका स्त्रोत नाथपंथियों की परंपरा रही हो या बौद्ध साधकों की परंपरा। पश्चिम में प्रमाणिक समझा जाने वाला चीनी यात्री इत्सिंग ही एकमात्र ऐसा विदेशी इतिहासकार है, जिसने भर्तृहरि का उल्लेख किंचित विस्तार से दिया है। किंतु यह परिचय स्वत: किवदंतियों एवं जनश्रुतियों पर आधारित है। वैयाकरणों के वक्तव्यों और ग्रथों के अतिरिक्त भर्तृहरि के इस वैयाकरण रूप का परिचय हमें उनके सम्बद इत्सिंग की उक्ति से ही मिलता है। जहां तक उनकी सर्वाधिक महत्वपूर्ण कृतियां ''महाभाष्यटीका एवं वाक्यपदीय'' का संबंध है। परंतु भर्तृहरि के संबंध में इत्सिंग का शेष वक्तव किंवदतियों एवं जनश्रुतियों पर आधारित है। उनके कथानुसार पूर्वोक्त दोनों स्त्रोतों से उपलब्ध तथ्य उन्हें स्वीकार थे और बौध्द परंपरा में गृहस्थ और संन्यास के बीच आवागमन की छूट दी है। इसीलिए यह वक्तव उन्हें बौध्द सिध्द करने का पर्याप्त आधार माना जा सकता है। इसके आधार पर भर्तृहरि का जीवनकाल 600 से 650 ईस्वी के आसपास का माना जा सकता है। महावैयाकरण भर्तृहरि का काल ''कोशिका'' की रचना सातवीं शती ई. से पूर्व ही होना चाहिए। अत: पांचवीं शती के आरंभ से लेकर छठी शती के आरंभ के बीच उनका काल रखना अधिक उचित है।

भर्तृहरि की कृतियां:-

श्री युधिष्ठिर मीमांसक ने विविध प्राचीन उल्लेखों के आधार पर निम्न नौ कृतियां बताई हैं।-

1 महाभाष्यटीका, 2 वाक्यपदीय, 3 वाक्यपदीय के प्रथम दो कांडों पर स्वोपज्ञा वृत्ति, 4 शतकत्रय-नीति श्रृंगार एवं वैराग्य, 5 मीमांसासूत्रवृत्ति, 6 वेदांतसूत्रवृत्ति, 7 शब्द धातुसमीक्षा, 8 भागवृत्ति, 9 भर्तृहाव्य

इनमें आठवें ग्रंथ के उनके द्वारा रचित न होने का कारण यह है कि न तो इसकी भाषा ही भर्तृहरि की प्रकृति के अनुकूल एवं सरल है और न ही इसमें व्यक्त बहुत से समाधान भर्तृहरि के महाभाष्यटीकोक्त एवं वाक्यपदीयोक्त मतों से मिलता है। शेष सातों रचनों में से प्रथम चार तो किसी न किसी रूप में उपलब्ध हैं, जबकि संख्या 5 से 7 तक की पुस्तकों का उनके नाम से केवल उल्लेख मात्र मिलता है।

''वाक्यपदीय'' तीन कांडों में निबध्द रचना है। पूर्वोक्त टीका में भर्तृहरि महाभाष्य की उक्तियों पर ही टिप्पणी कर रहे थे, अत: उन्हें अपने मतव्यों को न तो व्यक्त करने का अवकाश था और न ऐसा करना उचित ही था। इसीलिए भर्तृहरि ने उस प्रसंग में व्यक्त किए गए अपने संपूर्ण भाषाचितंन एवं व्याकरण दर्शन को स्वतंत्र रूप से पुनर्गठित करने पूर्ण स्वतंत्रता के साथ ''वाक्यपदीय के तीन कांडों में निबद्ध किया है।

महाभाष्यटीका:-

कैयट के ''महाभाष्यप्रदीप'' के अध्ययन एवं विश्लेषण से पता चलता है कि उसे न केवल ''वाक्यपदीय'' एवं ''महाभाष्यटीका'' दोनों का पूरा परिचय था, बल्कि उसने उन दोनों का पूरा लाभ भी उठाया है। तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया है कि कैयट एवं महाभाष्य के अन्य अनेक परवर्ती टीकाकारों ने भर्तृहरि की ''महाभाष्यटीका'' का अनुकरण संक्षेप मात्र ही किया है। स्वयं भर्तृहरि अपने वाक्यपदीय में 'भाष्य' की ओर बार बार इंगित करते हैं। वे सब बातें महाभाष्य में उल्लिखित नहीं मिलती। यदि भर्तृहरि की टीका पूर्णत: उपलब्ध होती, तब उनका तथ्यांकन हो सकता था। दूसरी ओर, यदि उनकी टीका का विश्लेषण किया जाये, तो वाक्यपदीय का कोई भी अध्येता यह पाएगा कि पदे-पदे वाक्यपदीय के ही वक्तव्य गद्यात्मक ढंग से कहे गये हैं। यह अवश्य है कि कहीं-कहीं शब्दावली वाक्यपदीय में प्रयुक्त शब्दावली से भिन्न हैं। पूर्ण विश्लेषण करने पर विद्वानों ने पाया है कि टीका की रचना निश्चय ही भर्तृहरि पहले ही कर चुके थे।

वाक्यपदीय:-

पिछले दो-तीन दशको में ही इस अकेली कृति ने विश्व के भाषाविदों का जितना ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया है, उतना किसी अन्य कृति ने नहीं। इसलिए इसे सवाधिक प्रामाणिक माना जाता है। इस पर भी क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है कि इसी शती के पाचवें दशक कके पूर्वार्ध्द तक इस कृति का एक भी पूर्ण एवं संपादित संस्करण उपलब्ध नहीं था जो कुछ था भी न मिलता था। पंचम दशक के उत्तरार्ध्द में इसके प्रथम कांड ब्रह्मकांड का पूर्ण एवं प्रामाणिक प्रथम संस्करण लाहौर से संपादित हुआ। भर्तृहरि के वाक्यपदीय को तीन काडों में विभाजित किया गया है।

1 प्रथम कांड: आगम या ब्रह्मकांड

2 द्वितीय कांड: वाक्यकांड

3 तृतीय कांड: व्याकरण का दर्शन

भाषाविज्ञान संबंधी योगदान :-

भर्तृहरि ने व्याकरण और भाषाविज्ञान दोनों ही क्षेत्र में अभूतपूर्ण योगदान दिए हैं। त्रिपदी टीका एवं वाक्यपदीय में व्यक्त धारणाओं एवं विवेचन को, व्याकरण संबंधी सामान्य धारणा से पृथक करके, महाभाष्य की पृष्ठभूमि पर समझने का प्रयास करना चाहिए।

1 वाक्: अभिव्यक्ति का माध्यम -

भर्तृहरि के अनुसार यदि वाणी का भाषा रूप या भषिक रूप न रहे, तो समस्त ज्ञान-विज्ञान ही नहीं, मानव की समस्त चेतन प्रक्रिया तक अर्थहीन हो जाएगी।
2
भाषा की परिभाषा:-

प्रयोक्ता (वक्ता) और ग्रहीता (श्रोता) के बीच अभिप्राय या आदान-प्रदान केवल शब्द के ही माध्यम से होता है। ज्यों ही प्रयोक्ता का बुद्धयर्थ बन जाता है, भाषा या शब्द का कार्य पूरा करता है।

3 भाषा का ज्ञानार्जन:-

भाषा सीखते समय बालक जो अशुध्द उच्चारण करता है, उसका दर्थ विनिश्चय उसके मूल शब्द के द्वारा किया जाता है।

4 भाषा:संस्कृत और प्राकृत रूप -

भाषा विकास के संबंध में प्रमुखत: दो मत हैं: ''अनित्यवाद एवं नित्यवाद। नित्यवाद के अनुसार भाषा दैवी या देव प्रदत्त है और उसे जन प्रचलित नए नए प्रयोग के द्वारा व्यतिकीर्ण होता है। अनित्यवाद के अनुसार जनता में प्रचलित होने वाला रूप ही मूल होता है।

5 साधु-असाधु प्रयोग:-

साधु या व्याकरण सम्मत शब्द वह है जो शिष्ट प्रयोग का विषय हो तथा आगम अर्थात शास्त्रादि में धर्मादि साधन के लिए व्यवहृत होता हो। आगम का अर्थ परंपरा से अविच्छिन्न उपदेश अर्थात श्रुतिस्मृति लक्षण ज्ञान हैं धर्म का विधान उन्ही श्रुतियों में किया है। श्रुति को अकर्तृक, अनादि और अविच्छिन्न माना है।

6 अपभ्रंश या लोकभाषा का महत्व:-

जिस प्रकार श्रुति के अविच्छिन्न होने से उसमें प्रयुक्त शब्द नित्य होते हैं, उसी प्रकार अर्थ को वहन करने एवं जन प्रयोग होने के कारण असाधु या अपभ्रंश शब्द भी अव्यवच्छेय होते हैं।

7 व्याकरण का प्रयोजन और क्षेत्र-

व्याकरण का प्रयोजन किसी नवीन या कृत्रिम भाषा का निर्माण नहीं है, बल्कि जनप्रयोग किसी शिष्ट प्रयोगाकूल शब्दों का साधुत्व विधान है ताकि उन शब्दों का प्रचलन एवं अनुकरण अधिकाधिक एवं उचित रूप में हो सके। आगम और श्रुति के नित्य एवं परंपरागत रूप में अविच्छिन्न होने के कारण साधु प्रयोग भी नित्य एवं विहित प्रयोगों पर आश्रित होता है। इसी कारण व्याकरण भी एक स्मृति ही है। इस व्याकरण का क्षेत्र केवल ''वैखरी'' या उच्चरित वाक् तक ही सीमित नहीं है, प्रत्युत ''मव्यमा और पश्यंती'' भी इसी के क्षेत्र में आती हैं।

8 शब्दब्रह्म-

मानव अभिव्यक्ति का एकमात्र माध्यम होने के वाक् या शब्द नित्य है, इसकी अर्थभावना से ही जागतिक प्रकिया चल पाती है।

-प्रस्‍तुति

योगेश उमाले

एम.ए., भाषा-प्रौद्योगिकी विभाग


प्रयोग क्षेत्र और प्रयुक्ति

दिनांक 5-4-10 को उपरोक्त विषय पर भाषा-विद्यापीठ के विद्यार्थियों द्वारा सामूहिक परिचर्चा की गई। इसमें सर्वप्रथम यह बात हुई कि शब्दों के प्रयोग के अलग-अलग क्षेत्र होते हैं। इन क्षेत्रों के आधार पर उनके अलग-अलग अर्थ होते हैं। जैसे- ‘चार्ज’ शब्द का प्रशासन में अर्थ है ‘कार्यभार’; पुलिस द्वारा लाठी चार्ज किए जाने पर इसका एक अलग अर्थ ‘भीड‌ पर लाठी से प्रहार’ हो जाता है। इसी प्रकार बैटरी चार्ज करने में चार्ज का अर्थ ‘उसकी विद्युत उर्जा को बढ़ाना’ हो जाता है। अत: किसी शब्द का किसी क्षेत्र विशेष में जो प्रयोग होता है उसे प्रयुक्ति (register) कहते हैं और उसके प्रयोग का क्षेत्र-विशेष ‘प्रयोग क्षेत्र’ (domain) कहलाता है।
आगे की चर्चा में देखा गया कि सामान्य (general) रूप में प्रयोग-क्षेत्र (domain) और प्रयुक्ति (register) का अर्थ बहुत विस्तृत होता है किंतु हमारी चर्चा में इसे समाजभाषाविज्ञान (sociolinguistics) के एक टर्म के रूप में देखा जाएगा। प्रयुक्ति (register) शब्द का भाषाविज्ञान में प्रयोग सर्वप्रथम 1956 में किया गया था। Thomas Bertram Reidin द्वारा भाषिक विविधता (language variation) के क्षेत्र में इसका प्रयोग किया गया था। हैलिडे ने भी कहा है कि प्रत्येक वक्ता के पास एक अलग समय में अलग प्रकार के अर्थों के चयन का विकल्प होता है। इसके बाद इसे कोड से जोड़कर भी देखा गया।
अंत में चर्चा करते हुए यह बात निकलकर सामने आई कि प्रयोग-क्षेत्र (domain) और प्रयुक्ति (register) सामान्यत: बहुत विस्तृत है, जहाँ हम इन्हें अलग-अलग भी समझ सकते हैं। किंतु जब हम समाजभाषाविज्ञान के अंतर्गत इनकी चर्चा करते हैं तो दोनों एक दूसरे के बिना नहीं आ सकते। समाज में भाषा का अध्ययन करते हुए हमें कुछ भाषाई इकाइयों मुख्यत: शब्दों के अलग-अलग अर्थ प्राप्त होते हैं। इन शब्दों के अनुप्रयोग के आधार पर (आवश्यक्ता के अनुसार) कुछ विशेष क्षेत्रों का निर्धारण कर दिया जाता है। ये क्षेत्र- विशेष ही प्रयोग-क्षेत्र कहलाते हैं। इन क्षेत्रों में शब्दों के जो रूप या प्रयोग मिलते हैं उन्हें प्रयुक्ति (register) कहते हैं।
(भाषा-विद्यापीठ में होने वाले मासिक परिचर्चा का सारांश)
प्रस्तुति धनजी प्रसाद
एम.ए., भाषा प्रौद्योगिकी विभाग

मगही (भाषा) की लिंग व्यवस्था

सत्‍येन्‍द्र कुमार

पी-एच.डी. भाषा-प्रौद्योगिकी


किसी भी भाषा का संश्लिष्ठ रूप उसकी सुदृढ़ता को, सुगठता को दर्शाता है, विशेषकर उसका सरलीकृत रूप में संश्लिष्ठ होना। उक्त आशय से संबंधित हिंदी की बोली मगही में लिंग के लिए यह बात सटीक बैठती है। मगही भाषा बोलनेवालों का एक अच्छा खासा क्षेत्र है, जिसमें 'बिहार' राज्य के पटना और उसके आस-पास के जिले जहानाबाद, गया, नालंदा और जमुई आदि प्रमुख हैं।

मगही भाषा में अगर लिंग की बात करें तो इस भाषा में एक ही लिंग दृष्टिगोचर होता है। यथा हिंदी व मगही के उदाहरण समानांतर दिए गए हैं-

हिंदी मगही

1. आप कहाँ जा रहे हैं? 1. अपने कहाँ जा रहलखिंन हें?

2. आप कहाँ जा रही हैं? 2. अपने कहाँ जायतहथिंन?

(आदरार्थक पुलिंग/स्त्रीलिंग प्रधान वाक्य )

3. तुम क्या कर रहे हो? 3. तू कउची कर रहलें हे \

4. तुम क्या कर रही हो? 4. तू कउची करीत हे ?

5. तू क्या कर रहा है? 5. तो कउची कर रहले हें\

6. तू क्या कर रही है? 6. तों कउची करीत हें\

उक्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि हिंदी और मगही की लिंग व्यवस्था में व्यापक अंतर है। हिंदी में जहाँ दो लिंग की व्यवस्था है वहीं इसकी बोली मगही में एक लिंग से ही स्त्री और पुरूष को संबोधित किया जा सकता है जिससे निश्चित रूप से मगही भाषा को जानने, समझने एवं व्यवहार में लाने में आसानी होगी।

मगही में संबोधन चिह्न के द्वारा हम लिंग का निर्धारण करते हैं। वक्ता द्वारा उच्चरित वाक्य स्त्रीलिंग है या पुलिंग। जैसे:-

स्त्रीलिंग के लिए संबोधन- ''अगे''

पुलिंग के लिए संबोधन- ''अरे''

उक्त संबोधन के अलावा 'अजी' संबोधन स्त्रीलिंग और पुलिंग दोनों के लिए प्रयुक्त होता है। यथा: 'अजी की कर रहलहो हे/अजी का करीत ह। (ऐ जी- क्या कर रहे हैं/ऐ जी- क्या कर रही हैं )।

वर्तमान समय में भारतीय भाषा संस्थान मैसूर में बोलियों के भी कार्पस बनाए जा रहें हैं जिसके लिखित एवं मौखिक कॉरपोरा का उपयोग मशीनी अनुवाद में अपेक्षित होता है। ऐसे में हमें ज्ञात हो कि हरेक भाषा का अपना एक विशिष्ट महत्व होता है। इसलिए अगर हिंदी में या किसी भी समृध्द भाषा में किसी विश्ष्टि संकल्पना को उभारने के लिए शब्द नहीं हों और किसी अन्य भाषा या बोली में हों तो सहजता से ग्रहण किए जाते हैं इस दृष्टिकोण से कोई भी भाषा या बोली के बोलने वाले समुदाय चाहे वह अल्प हो या अधिक उसकी संकल्पनात्मक शब्दशक्ति का अपना महत्व होता है जिसकी मदद से दूसरी(अन्य)भाषाएँ समृध्द, सम्पन्न और सहज होती हैं।

वर्तमान युग प्रौद्योगिकी का युग है इस दृष्टि से मगही व हिंदी के तुलनात्मक विश्लेषणात्मक या विवरणात्मक अध्ययन के आधार पर विश्लेषित आंकड़ों को लिंग व्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में तथा क्रिया रूपों को भी सरलता से मशीन हेतु सुग्राह्य बनाया जा सकता है क्योंकि (मगही में) लिंगानुसार क्रिया का रूप नहीं बदलता। इस प्रकार यह (मगही) जाटिलता के अभाव व सरलता के निकट होने से मानव एवं मशीन(विशेषज्ञ यंत्र/Expert System/ Computer) हेतु सरल एवं ग्राह्य है।

संदर्भ- मगही क्रियाओं का भाषावैज्ञानिक अध्ययन: शीला वर्मा

मगही की संयुक्त क्रियाओं का भाषावैज्ञानिक अध्ययन:डॉ. कुमार इंद्रदेव