30 मार्च 2010

भाषा की द्वैत संरचना (Duality Of Patterns)

मोहिनी मुरारका
एम.ए.हिंदी(भा.प्रौ.)
भाषा अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम है। भाषा के द्वारा मनुष्य अपने विचारों एवं भावों को अभिव्यक्त करता है। किंतु भाषा जहाँ विचारों को प्रकट करने का कार्य करती है वही दूसरी ओर भावों को छिपाती भी है। भाषा मनुष्य को ऐसा प्रकृति प्रदत्ता वरदान मिला है जिसके माध्यम से मनुष्य पषु जगत से अपनी अलग पहचान बना पाया है। यदि भाषा को परिभाषित किया जाए तो -''भाषा उच्चारण अवयवों से उच्चरित मूलत: यादृच्छिक स्वन प्रतिकों की वह व्यवस्था है जिसके द्वारा किसी भाषा समाज के लोग आपस में विचारों का आदान-प्रदान करते हैं।''
प्रसिध्द अमेरिकी भाषाविद् चार्ल्स एफ. हॉकेट ने सन् 1958 में (Course Of Modern Linguistics½ नामक किताब लिखी। जिसमें उन्होनें भाषा के सात अभिलक्षण (Design Feature Of Language½ बताए हैं। किंतु कुछ विद्वानों ने इन अभिलक्षणों की संख्या नौ बताई है जो निम्नलिखित है-
1. यादृच्छिकता 2. सृजनात्मकता 3. अनुकरणग्राहता 4. परिवर्तनशीलता 5. विविक्तता 6. द्वैतता 7. भूमिकाओं का पारस्परिक परिवर्तन 8. अंतरणता 9. असहजवृत्तिाकता।
हॉकेट ने अपने अभिलक्षणों में मुख्य रूप से भाषा की द्वैत संरचना (Duality Of Patterns½ का वर्णन किया है। इसमें उन्होनें बताया कि मानव भाषा, मानवेतर भाषा से किस प्रकार भिन्न है। मानवीय भाषा भाषिक संप्रेषण की भाषा है और प्रत्येक भाषा की अपनी एक संरचना और व्यवस्था होती है। जिसमें कुछ सार्थक तथा कुछ निरर्थक इकाइयाँ होती है। भाषा में प्रयुक्त सार्थक इकाईयों को रूपिम कहते हैं और निरर्थक इकाईयों को स्वनिम कहा जाता है। कोई भी वाक्य इन इकाइयों के योग से बनता है। अत: इसे द्वैतता कहा जाता है। मानव भाषा में यह द्वैतता अभिव्यक्ति के स्तर पर देखी जा सकती है जिसमें सीमित ध्वनियों के आधार पर असीमित वाक्य का सृजन किया जाता है। भाषा के दो पक्ष होते हैं- 1. अभिव्यक्ति पक्ष और 2. कथ्य पक्ष। अभिव्यक्ति पक्ष में स्वनिम का विषेश महत्तव होता है, वहीं दूसरी ओर कथ्य पक्ष में रूपिम का। स्वनिम निरर्थक इकाईयाँ होने पर भी सार्थक इकाईयों का निर्माण करती है। उदाहरण के लिए - क+अ+म+अ+ल में पाँच स्वनिम निरर्थक इकाईयाँ है जो कमल सार्थक शब्द का निर्माण करती है। यहाँ एक बात यह भी स्पष्ट करना आवश्यक है कि केवल ध्वनि को भाषा नहीं कहा जा सकता है और न ही अर्थ को। अत: ध्वनि और अर्थ दोनों का सान्निध्य ही भाषा है। किंतु पशुओं की ध्वनि उनके लिए संप्रेषणीय हो सकती है। इसी संदर्भ में Herbert Terrace (1979) ने Nim Chimpsky नामक Chimpanzee पर अपना भाषा संबंधी शोध कार्य किया था। इसी प्रकार Francine Patterson द्वारा koko पर किया गया शोध उल्लेखनिय है।
(भाषा विद्यापीठ में होनेवाली सामूहिक परिचर्चा का सारांश)

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